समीक्षा

प्रकाशक अरुण प्रकाशन आवरण - प्रवीण राज प्रथम संस्करण - 2015 मूल्य - 475 रुपए , पृष्ठ - 240 ई -54 , मानसरोवर पार्क शाहदरा , दिल्ली - 11032
1. गंधाती, बजबजाती पत्रकारिता को आईना 2. रंग बिरंगे साँप हमारी दिल्ली में, क्या कर लेंगे आप हमारी दिल्ली में 3. किन्नर समाज की पुरज़ोर पैरवी और शिनाख्त 4. अमरीका की धरती पर भारतीयता की खुशबू में लिपटी कहानियां 5. सहजता का स्पेस 6. कहां जा रही है ददरी मेले वाली लोक संस्कृति? 7. आज की स्त्री की जिजीविषा - अपने लिए अपनों के खिलाफ 8. विद्रोह की दस्तक 9. कभी न समाप्त होने वाले प्रश्नों की पीड़ा  10. पूर्वांचल के एक लोकप्रिय गायक की जीवन की स्थितियों के समानांतर रची गई दुनिया 11. दूधनाथ के निष्कासन और अखिलेश के ग्रहण के बहाने दलित विमर्श पर कुछ सवाल 12. स्त्री स्वतंत्रता और उस की अस्मिता को सही संदर्भों और अर्थों में पहचानने की एक सशक्त कोशिश 13. पूर्वांचल की नई स्त्री को व्यक्तित्व देती कथा : ‘बांसगांव की मुनमुन’ 14. ये हारकर भी जीते हुए लोग हैं 15. ‘अपने-अपने युद्ध’ और पत्रकारों की बिरादरी 16. सेक्स, प्यार और मोरालिटी 17. ''कचहरी तो बेवा का तन देखती है'' 18. दयानंद जी के हारमोनियम के सूर्य प्रताप कौन हैं? 19. अनिल यादव, अब ऐतराज भी सुनिए 20. जहां लोकतंत्र दम तोड़ देता है वहां... 21. कु-व्यवस्था तंत्र में फंसे आदमी की छटपटाहट 22. बर्फ होती मुश्किलों में धूप 23. छीजती मानवीय संवदेना को सहेजती ‘मुनमुन’ 24. अपने-अपने युद्ध: विसंगतियों का दस्तावेज़

25. स्याह होती संवेदनाओं में रंग भरती दयानंद पांडेय की कहानियाँ 

26. यह उपन्यास पुरुष-प्रधान समाज को एक धक्का है

 

 27. भ्रष्ट व्यवस्था पर पैनी चोट

32.सुधाकर अदीब का नया रोमांस है शाने तारीख ! 33.कस्बाई परिवेश का प्रभावी उपन्यास 34.कुछ मुलाकातें, कुछ बातें : सवाल रूपी मशाल जलाती बातें-मुलाकातें 35.संपूर्ण आंगन है यादों का मधुबन 36. औरत बदल रही है वह अब केवल पिजरे में बंद तोता नहीं रही 37. व्यवस्था के प्रति विश्वास जगाने की कहानी 38. फूल सी मुनमुन जब ज्वालामुखी बन जाती है ! 39.काश हर लड़की मुनमुन जैसी हो, जिस में अपने साथ होते हुए अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार लेने की हिम्मत हो ! 40.स्त्री मन को झकझोर देने वाली कहानियां  41.  पारिवारिक जीवन की बारीकियों पर नज़र 42.मीडिया के दिल भी हारमोनियम जैसे हैं जो बजते-बजते किसी पत्थर की चोट से टूट जाते हैं 43. अंधेरे सवालों के उजले जवाब 44.  जहां सांसों में बसता है सिनेमा 45. विषय के अंतिम तह तक धंस कर लिखने की जिद और नकलीपन से मुक्त कहानियों का स्पेस  46. अखिलेश के महेश लाल चाहते हैं कि उन की बेटी किसी के साथ भाग जाए !  47.  बाज़ार और ज़िंदगी को ज़िंदगी में गहरे धंस कर खंगालता एक उपन्यास लोक कवि अब गाते नहीं   48.  राजनीति के जंगल में औरतों के भूखे न जाने कितने भेड़िये रहते हैं जो उन की देह चाटते रहते हैं 49.  अखबारी दुनिया के मालिकों व इस के कर्मचारियों की ज़िंदगी में झांकना हो तो इस उपन्यास को ज़रूर पढ़ें  50.  गांधीवादी राजनीति का सपना देखने वाला, आज की जातिवादी और सांप्रदायिक राजनीति से हारता आनंद 51. लोककवि जब अपनी सफलता के लिए डांसर लड़कियों के मोहताज़ हो जाते हैं 52.  डिप्रेशन , फ्रस्ट्रेशन और गुस्से का मारा संजय हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति की कुर्सी के सामने मूत आता है 53. लेकिन इन प्रेम कहानियों में तो फ़्लर्ट है, छलना है, नाटकीय, प्रायोजित मोड़ और कल्पित संभावनाएं हैं  54.  इन कहानियों में निरीक्षण क्षमता तो है परंतु गहरे उतर कर पात्रों के अंतर्मन को खंगालने में चूक  55. डलिया भर हरसिंगार-अक्षर 56. नागफनी के मरुथल में शीतल मलयज बयार 57.  लोक कवि अब गाते नहीं यानी देखना, महसूसना और लिखना साथ-साथ ! 58.  मीडिया का नग्न आत्मयुद्ध 59. पाठकों की अदालत में हैं अब समीक्षक 60. मूल्यों के क्षरण का महाआख्यान है दयानंद पांडेय विरचित उपन्यास 'बांसगांव की मुनमुन' 61.  केशव कहि न जाय का कहिए ........ 62. लेखक को जैसी सज़ा मिलनी चाहिए  63.बड़की दी का यक्ष प्रश्न : क़िस्सागोई की लयबद्धता और कहानियों में टटकापन    64. विवादों की ज़मीन पर खड़ा एक उपन्यास : अपने-अपने युद्ध  65. अप्रासंगिक होते पात्रों की पैरवी  66. देह की छांह तलाशते लोक कवि 
67.  दृष्टि की सीमा  68. स्थान बनाती कहानियां  69.  पहचाना संसार  70. सामाजिक सरोकार के बावजूद 71.  लोक संस्कृति , बाज़ारवाद और राजनीति की संघर्षगाथा  72. स्त्री-मन की कविताएं  73. समाज के चेहरे से मुखौटा नोचती कहानियां
प्रकाशक प्रेमनाथ एंड संस  आवरण - प्रवीण राज प्रथम संस्करण - 2015 मूल्य - 250 रुपए , पृष्ठ - 136 30 / 35-36 , द्वितीय तल , गली नंबर - 9 विश्वास नगर ,  दिल्ली - 11032